Hindi Notes For Svar स्वर Vowel Vyanjan व्यंजन Consonant Notes

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भाषा और स्वर (vowel), व्यंजन (consonant)की उत्पति एवम् उनके प्रकार

Language is the means through which we view the body language, expressions, express, and the words have been derived from Sanskrit Bash. Bash is metal denote

भाषा वह साधन है जिसके माध्यम से हम अपने विचार ओर हाव,भाव को व्यक्त करते,तथा भाषा शब्द संस्कृत के भाष् से व्युत्पन्न किया गया है। भाष् धातु का अर्थ प्रकट करना है।

ध्वनि भाषा – यह हमारे शरीर की सबसे छोटी इकाई है, ओर ध्वनि भाषा की लघुत्तम और वाक्य भाषा की पुर्ण इकाई माना जाती है।

व्याकरण- जो भाषा का विश्लेषण करती है वह व्याकरण कहलाती है।

वर्ण विचार तीन प्रकार के होते है Consider three types of characters

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(1) Characters

(2) words

(3) sentence

There are currently 44 types of characters in Hindi has been divided into two parts: (1) vowel and (2) consonant

(1) vowel (11) types of

(2) consonant (33) types of

(1) वर्ण

(2) शब्द

(3) वाक्य

हिन्दी में 44 प्रकार के वर्ण होते है जिनको दो भागों में बांटा गया है- (1) स्वर और (2) व्यंजन

(1) स्वर (11)  प्रकार के होते है

(2) व्यंजन(33) प्रकार के होते है

स्वर vowel

Which sounds similar in pronunciation may not need the assistance of another voice, the voice called.

 vowel (11) types of

A, B, C, E, A, F, A, O, O, Au, RI, etc.

The tone is divided into two parts

(1) Hrisw  vowels (4) types of

(2) The long vowels (7) types of

ऐसी ध्वनियां जिनका उच्चारण करने में अन्य किसी ध्वनि की सहायता की आवश्यकता नहीं हो, उसे स्वर कहा जाता हैं।

स्वर (11) प्रकार के होते है

अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ, आदि

स्वर को दो भागों में बांटा गया है

(1) हृस्व स्वर जो (4) प्रकार के होते है

(2) दीर्घ स्वर  जो (7) प्रकार के होते है

(1) हृस्व स्वर -जिन स्वरों के उच्चारण में उपेक्षाकृत कम समय लगता हो,उनको हृस्व स्वर कहा जाता है

जैसे- अ, इ, उ, ऋ आदि

(2) दीर्घ स्वर – जिन स्वरों को बोलने में अधिक समय लगता हो,उनको दीर्घ स्वर कहा जाता है

जैसे- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ आदि

(2) व्यंजन

वे ध्वनियां जो स्वरों की सहायता से बोली जाती है उन्हें व्यंजन कहा जाता है।

व्यंजन 33 प्रकार के होते है

इन्हें 5 वर्गो तथा स्पर्श, अन्तस्थ, ऊष्म व्यंजनों में बांटा बांटा गया है।

(1) स्पर्श  व्यंजन – 25 प्रकार के होते है

क वर्ग – क ख ग घ ड़ आदि

च वर्ग – च छ ज झ ञ आदि

ट वर्ग – ट ठ ड ढ ण आदि

त वर्ग – त थ द ध न आदि

प वर्ग – प फ ब भ म आदि

(2) अन्तस्थ व्यंजन – 4  प्रकार के होते है

जैसे य र ल व आदि

(3) ऊष्म व्यंजन – 4  प्रकार के होते है

जैसे  श् ष् स् ह् आदि

संयुक्ताक्षर – इसके अतिरिक्त हिन्दी में तीन संयुक्त व्यंजन भी होते हैं-

क्ष – क् + ष्

त्र – त् + र्

ज्ञ – ज् + ञ´

Note: हिन्दी वर्ण माला में 11 स्वर और 33 व्यंजन अर्थात कुल 44 वर्ण है तथा तीन संयुक्ताक्षर है।

वर्णो के उच्चारण स्थान

भाषा को शुद्ध रूप से बोलने और समझने के लिए वर्णो के उच्चारण स्थानों को जानना आवश्यक है –

  वर्ण                                     उच्चारण स्थान             वर्ण ध्वनि का नाम

अ, आ, क वर्ग आदि                       कंठ कोमल तालु                 कंठ्य और विसर्ग

इ, ई, च वर्ग, य, श आदि               तालु                                        तालव्य

ऋ, ट वर्ग, र्, ष आदि                   मूद्र्धा                                      मूर्द्धन्य

लृ, त वर्ग, ल, स आदि                  दन्त                                       दन्त्य

उ, ऊ, प वर्ग आदि                       ओष्ठ                                       ओष्ठ्य

अं, ङ, ञ, ण, न्, म् आदि             नासिका                                 नासिक्य

ए ऐ आदि                                     कंठ तालु                               कंठ – तालव्य

ओ, औ आदि                               कंठ ओष्ठ                               कठोष्ठ्य

व आदि                                       दन्त ओष्ठ                               दन्तोष्ठ्य

ह आदि                                        स्वर यन्त्र                              अलिजिह्वा

अनुनासिक ध्वनियों के उच्चारण में वर्ण विशेष का उच्चारण स्थान के साथ-साथ नासिका का भी योग रहता है।

अतः अनुनासिक वर्णों का उच्चारण स्थान उस वर्ग का उच्चारण स्थान और नासिका होगा।

कंठ और नासिका दोनो का उपयोग होता है तो उच्चारण स्थान कंठ नासिका होता है

जैसे- अं

उच्चारण की दृष्टि से व्यंजनों को आठ भागों में बांटा गया है।

स्पर्शी व्यंजन:

जिन व्यंजनों के उच्चारण में फेफड़ों से छोड़ी जाने वाली हवा वाग्यंत्र के किसी अवयव का स्पर्श करती हो और फिर बाहर निकलती हो वह व्यंजन स्पर्शी व्यंजन कहलाता है।

जैसे

क् ख् ग् घ् ; ट् ठ् ड् ढ् आदि

त् थ् द् ध् ; प् फ् ब् भ् आदि

 संघर्षी व्यंजन:

जिन व्यंजनों के उच्चारण में दो उच्चारण अवयव इतनी निकटता पर आ जाते हैं कि बीच का मार्ग छोटा हो जाता है तब वायु उनसे घर्षण करती हुई निकलती हो उन व्यंजनों को संघर्षी व्यंजन कहा जाता हैं

जैसे श्, ष्, स्, ह्, ख्, ज्, फ् आदि

स्पर्श संघर्षी:

जिन व्यंजनों के उच्चारण में स्पर्श का समय अपेक्षाकृत अधिक होता है और उच्चारण के बाद वाला भाग संघर्षी हो जाता है, तो उनको स्पर्श संघर्षी व्यंजन कहा जाता हैं

जैसे – च्, छ्,ज्, झ्, आदि

नासिक्य:

जिनके उच्चारण में हवा का प्रमुख अंश नाक से निकलता हो तो उनको नासिक्य व्यंजन कहा जाता हैं

जैसे ङ्, ञ, ण्,न, म् आदि

पाशरविक:

जिनके उच्चारण में जिह्वा (जीभ) का अगला भाग मसूड़े को छूता है और वायु पाश्र्व आस-पास से निकल जाती है,तो उनको  पाशरविक व्यंजन कहा जाता – जैसे – ल्

प्रकम्पित:

जिन व्यंजनों के उच्चारण में जिह्वा (जीभ) को दो तीन बार कंपन करना पड़ता है, तो उनको प्रकंपित व्यंजन कहा जाता हैं। जैसे-र

उत्क्षिप्त:

जिनके उच्चारण में जिह्वा (जीभ)  की नोक झटके से नीचे गिरती है तो वह उत्क्षिप्त (फेंका हुआ) ध्वनि कहलाती है। जैसे ड्, ढ् उत्क्षिप्त ध्वनियाँ हैं।

संघर्ष हीन:

जिन ध्वनियों के उच्चारण में हवा बिना किसी संघर्ष के बाहर निकल जाती है तो वे संघर्षहीन ध्वनियाँ कहलाती हैं। जैसे-य, व।,इनके उच्चारण में स्वरों से मिलता जुलता प्रयत्न करना पड़ता है, इसलिए इन्हें अर्धस्वर भी कहते हैं।

स्थिति और कम्पन्न के आधार पर वर्णो को दो भागों में बांटा गया है।

घोष

अघोष

(1) घोष

घोष का अर्थ गूंज होता है ओर जिन वर्णो का उच्चारण करते समय गूंज होती है उन्हें घोष वर्ण कहते है तथा व्यंजन के तीसरे चोथे और पांचवें व्यंजन (ग,घ,ड़,ज,झ, ञ,ड,ढ,ण,द,ध,न,ब,भ,म)आदि तथा य,र,ल,व,ह घोष है। ओर इसके अतिरिक्त सभी स्वर भी घोष वर्ण के  होते हैं। तथा इनकी संख्या 30 होती है।

(2) अघोष

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इन वर्गो के उच्चारण में प्राणवायु में कम्पन्न नहीं होती उन्हें अघोष वर्ण कहते हैं। व्यंजन वर्गो के पहले और दुसरे व्यंजन(क,ख,च,छ,ट,ठ,त,थ,प,फ) आदि तथा श् ष् स् आदि सभी वर्ण अघोष है तथा इनकी संख्या तेरह होती है।

श्वास वायु के आधार पर वर्णों के दो प्रकार के भेद होते है-

(1) अल्पप्राण

(2) महाप्राण

(1) अल्पप्राण

जिन व्यंजनों के उच्चारण में सांस की मात्रा कम लगानी पड़ती है, उन्हें अल्पप्राण कहते है।वर्गो का पहला,तीसरा, और पांचवां वर्ण(क ग ड़ च ज ञ ट ड ण त द न प ब म आदि) तथा य र ल व औ सभी स्वर अल्प प्राण प्रकार के होते है।

(2) महाप्राण

जिन वर्णो के उच्चारण में सांस की मात्रा अधिक लगानी पड़ती है तो उन्हें महाप्राण व्यंजन कहते हैं। प्रत्येक वर्ग का दुसरा और चैथा वर्ण(ख,घ,छ,झ,ठ,ढ,थ,ध,फ,भ आदि) तथा श,ष,स,ह महाप्राण व्यंजन कहा जाता है।

अनुनासिक

अनुनासिक ध्वनियों के उच्चारण में नाक का सहयोग होता है।

जैसे – अं, आं, ईं,ऊं आदि ।

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